जब साधन और साध्य का उचित समन्वय होता है, तब साध्य तक पहुँचने वाला रास्ता आसान तथा मधुरमय हो जाता है | परन्तु साधन और साध्य मे समन्वय स्थापित कर पाना अत्यन्त जटिल कार्य है | अब आपका ये सोंचना के ये विचार हमारे अत्यंत छोटे से दिमाग मे आया कैसे अनुचित नहीं होगा | यहाँ ये साफ़-साफ़ बताना हमारा परम कर्तव्य बनता है की "साधन और साध्य का उचित समन्वय" वाला विचार हमारे दिमाग में आया नहीं बल्कि हमारे पूज्य पिताश्री द्वारा डाला गया है | पहले पहल तो बड़ी दिकात पेश आई, परन्तु जैसे-जैसे हम आगे बड़ते गए रास्ता आसान होता गया अर्थात समन्वय बनता गया | क्रोध आदर मे परिवर्तित होता गया और एक नए विचार का जन्म हुआ, नया विचार कहता है की "जब व्यक्ति आपने साध्य पर पूर्ण निष्ठा रखता है तो वह साध्य तक पहुचने का साधन खोज ही लेता है"
तो भक्त जनों इस गूढ़ रहस्य को समझो और आपना जीवन आसान तथा मधुरमय बनाओ |




